Securities and Exchange Board of India (Sebi) ने IPO में retail quota को घटाने के अपने प्रस्ताव को वापस ले लिया है। पहले Sebi ने यह सुझाव दिया था कि 5,000 करोड़ रुपये से अधिक के बड़े IPO में retail quota को 35 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत किया जाए, लेकिन अब यह क्वोटा पहले जैसा ही 35 प्रतिशत रहेगा। Sebi ने बताया है कि इस प्रस्ताव को वापस लेने का मुख्य कारण IPO में retail investors और अन्य स्टेकहोल्डर्स से मिले फीडबैक को ध्यान में रखना है। इससे पहले Sebi ने जुलाई 2025 में एक consultation paper जारी किया था जिसमें यह प्रस्ताव रखा गया था कि बड़े IPO में retail investors के लिए आवंटन कम करके Qualified Institutional Buyers (QIB) के हिस्से को बढ़ाया जाए। प्रस्ताव के अनुसार, 35 प्रतिशत retail quota को घटाकर 25 प्रतिशत किया जाना था, जबकि QIB का हिस्सा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत किया जाना तय था। Sebi का तर्क था कि बड़े IPO में retail investors की सब्सक्रिप्शन कम होती है और ऐसे में QIB को ज्यादा हिस्सा देने से डिमांड स्थिर रहेगी और इश्यू सफल रहेगा। हालांकि, इस प्रस्ताव को बाजार के कई हिस्सेदारों की ओर से कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों ने कहा कि retail सब्सक्रिप्शन के साथ-साथ प्राइसिंग को भी ध्यान में रखना चाहिए। उन्होंने Sebi से अनुरोध किया कि केवल retail quota कम करने के बजाय, कंपनी के प्राइसिंग स्ट्रेटेजी और अन्य मार्केट फंडामेंटल फैक्टर्स पर भी विचार किया जाए। Sebi ने यह भी माना कि बड़े IPO में retail हिस्सा कम करना बाजार की वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करेगा, लेकिन साथ ही mutual funds के लिए QIB श्रेणी में आरक्षण को 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने का प्रस्ताव भी रखा था
Sebi के अनुसार, mutual funds के माध्यम से retail निवेशकों की भागीदारी में पिछले कुछ वर्षों में वृद्धि हुई है, इसलिए retail quota को कम करने के बावजूद mutual funds के हिस्से को बढ़ाना निवेशकों के हित में होगा। Sebi ने यह भी बताया कि बड़े IPO में retail हिस्सेदारी को सफलतापूर्वक सब्सक्राइब करने के लिए लाखों retail निवेशकों की जरूरत होती है। उदाहरण के तौर पर, Hyundai Motor के 27,859 करोड़ रुपये के IPO में retail subscription मात्र 0.4 गुना रही, Hexaware Technologies के 8,750 करोड़ रुपये के IPO में 0.1 गुना और Afcons Infra के 5,430 करोड़ रुपये के IPO में 0.9 गुना सब्सक्रिप्शन हुआ। Sebi के मुताबिक, 5,000 करोड़ रुपये के IPO में करीब 7-8 लाख retail आवेदन आवश्यक होते हैं और 10,000 करोड़ रुपये की पेशकश के लिए लगभग 17.5 लाख retail निवेशकों की जरूरत होती है। Sebi के इस प्रस्ताव पर उद्योग संगठनों और merchant bankers ने भी प्रतिक्रिया दी थी। इनकी राय थी कि retail quota कम करना जरूरी नहीं है, बल्कि IPO की कीमत और बाजार की स्थितियों को भी समझना चाहिए। Sebi ने बताया कि उन्होंने कंपनियों और merchant bankers को प्राइसिंग संबंधी मुद्दों पर संकेत दिए थे, लेकिन किसी भी दिशा-निर्देश जारी करने से बचा क्योंकि इससे बाजार में हस्तक्षेप का आरोप लग सकता था। हालांकि, अब Sebi ने पुनर्विचार करते हुए यह स्पष्ट किया है कि 35 प्रतिशत retail quota को बनाए रखा जाएगा, जैसा कि SEBI (ICDR) Regulations, 2018 के Regulation 32 में निर्धारित है। Sebi ने कहा कि इस मामले में stakeholder feedback को लगातार मॉनिटर किया गया है और अंततः इस फैसले पर पहुंचा गया है ताकि बाजार में संतुलन बना रहे और निवेशकों का विश्वास बना रहे। इसके साथ ही Sebi ने एक और प्रस्ताव भी जारी किया है जिसमें बड़े बाजार पूंजीकरण वाली कंपनियों (जिनका post-listing market cap 50,000 करोड़ रुपये या उससे अधिक है) को कम stake dilution के साथ लिस्टिंग करने और minimum public shareholding (MPS) नियमों का पालन करने के लिए अधिक समय देने का सुझाव दिया गया है
यह कदम भी बड़े IPO में कंपनियों की सुविधा और बाजार स्थिरता को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। कुल मिलाकर, Sebi के इस U-turn से यह स्पष्ट हो गया है कि regulator बाजार और निवेशकों के हितों का ध्यान रखते हुए अपनी नीतियों में लचीलापन दिखा रहा है। बड़े IPO में retail investors की भूमिका को कमजोर करने के बजाय Sebi ने प्रयास किया है कि उनकी भागीदारी को बनाए रखा जाए और साथ ही institutional investors के साथ संतुलन भी बना रहे। यह फैसला निश्चित रूप से IPO बाजार में निवेशकों के उत्साह को बढ़ावा देगा और कंपनियों को भी भरोसा देगा कि उनकी पूंजी जुटाने की प्रक्रिया पारदर्शी और संतुलित बनी रहेगी