भारत के वित्तीय बाजारों में क्रेडिट रेटिंग सिस्टम को और मजबूत बनाने के लिए SEBI ने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पेश किया है, जो देश की वित्तीय पारदर्शिता और निवेशकों के विश्वास को बढ़ाने में मदद करेगा। इस प्रस्ताव के तहत SEBI ने Credit Rating Agencies (CRAs) के दायरे को बढ़ाने की योजना बनाई है, जिससे वे अब केवल SEBI के तहत आने वाले सिक्योरिटीज़ तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि RBI, IRDA, PFRDA जैसे अन्य वित्तीय नियामकों के तहत आने वाले वित्तीय उपकरणों को भी रेट कर सकेंगी। इससे भारत के क्रेडिट रेटिंग इकोसिस्टम में एक बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है। वर्तमान में, SEBI-registered CRAs केवल उन्हीं सिक्योरिटीज़ को रेट कर सकती हैं जो मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध या सूचीबद्ध होने के प्रस्तावित हैं। हालांकि SEBI के नियम अन्य वित्तीय उत्पादों को रेट करने पर स्पष्ट प्रतिबंध नहीं लगाते, लेकिन अन्य वित्तीय नियामकों के दिशानिर्देश न होने के कारण इस क्षेत्र में अस्पष्टता बनी हुई थी। इस लंबे समय से चले आ रहे नियामकीय अंतर को पूरा करने के लिए SEBI ने इस नए प्रस्ताव की घोषणा की है, जिससे CRAs को अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करने का अधिकार मिलेगा। SEBI ने अपने कंसल्टेशन पेपर में यह स्पष्ट किया है कि अब CRAs को उन वित्तीय उपकरणों को रेट करने की अनुमति दी जाएगी जो RBI, IRDA, PFRDA, IFSCA, MCA, और IBBI जैसे अन्य वित्तीय क्षेत्रीय नियामकों के तहत आते हैं, बशर्ते कि कुछ विशेष सुरक्षा उपायों को लागू किया जाए। इन सुरक्षा उपायों में शामिल हैं Separate Business Units (SBUs) का गठन, जिससे SEBI के नियमों के बाहर आने वाली गतिविधियाँ पूरी तरह से अलग और स्वतंत्र रूप से संचालित होंगी। SBUs को Chinese Wall Policy के तहत SEBI के तहत संचालित व्यवसाय से कड़ाई से अलग रखना होगा, ताकि कर्मचारियों का फ्री मूवमेंट न हो और कोई भी जानकारी लीक न हो। इसके अलावा, प्रत्येक SBU को स्वतंत्र रिकॉर्ड रखने होंगे और अलग-अलग कर्मचारी नियुक्त करने होंगे
CRAs को अपनी वेबसाइट पर सभी गैर-SEBI गतिविधियों का खुलासा करना अनिवार्य होगा और हर रिपोर्ट में यह स्पष्ट करना होगा कि इन गैर-SEBI गतिविधियों के लिए SEBI की निवेशक सुरक्षा लागू नहीं होती। साथ ही, CRAs को अपनी न्यूनतम नेट वर्थ सुरक्षा को गैर-SEBI गतिविधियों से बचाए रखना होगा ताकि निवेशकों के हित सुरक्षित रहें। SEBI ने यह भी निर्देश दिया है कि ये सभी गैर-SEBI गतिविधियाँ केवल फीज़ आधारित और नॉन-फंड आधारित होंगी, ताकि निवेशकों के लिए कोई वित्तीय जोखिम उत्पन्न न हो। प्रस्ताव के तहत CRAs को इस नए फ्रेमवर्क के लागू होने के छह महीने के भीतर SEBI को अनुपालन रिपोर्ट जमा करनी होगी, जिससे नियामक यह सुनिश्चित कर सके कि सभी नियमों का पालन हो रहा है। SEBI का यह कदम क्रेडिट रेटिंग के क्षेत्र में आ रही मौजूदा खामियों को दूर करने और बाजार में व्यापक कवरेज लाने का प्रयास है। अब तक कई अनलिस्टेड डेब्ट इंस्ट्रूमेंट्स और issuer-level मूल्यांकन ऐसे थे जिनका कोई स्पष्ट रेटिंग सिस्टम नहीं था, जिससे निवेशकों के लिए जोखिम बढ़ जाता था। इस प्रस्ताव के लागू होने से ये वित्तीय उपकरण भी रेटिंग के दायरे में आ सकेंगे, जिससे निवेशकों को बेहतर जानकारी और सुरक्षा मिलेगी। फाइनेंशियल मार्केट्स में पारदर्शिता बढ़ाने और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को अन्य वित्तीय क्षेत्रीय नियामकों के तहत आने वाले वित्तीय उत्पादों को रेट करने का अधिकार देने का मतलब है कि वित्तीय बाजारों में एक नई क्रांति आ सकती है। यह कदम भारत के क्रेडिट रेटिंग परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाएगा और निवेशकों के लिए भरोसे का माहौल तैयार करेगा। इस बदलाव के लिए SEBI ने जनता से 30 जुलाई 2025 तक अपनी टिप्पणियां मांगी हैं, जिससे विभिन्न हितधारक अपनी राय दे सकें
यह प्रस्ताव यदि लागू हुआ तो CRAs को अपने व्यवसाय के विस्तार के साथ-साथ बेहतर निगरानी और पारदर्शिता के लिए मजबूर किया जाएगा, जो अंततः पूरे वित्तीय प्रणाली को मजबूत बनाएगा। इस प्रकार, SEBI का यह प्रस्ताव न केवल क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को अधिक स्वतंत्रता देगा, बल्कि निवेशकों की सुरक्षा और वित्तीय बाजारों की विश्वसनीयता को भी एक नई दिशा देगा। भारत के जटिल और विकसित होते हुए वित्तीय बाजारों में यह कदम समय की मांग था, जो आने वाले वर्षों में भारत को एक मजबूत और पारदर्शी क्रेडिट रेटिंग व्यवस्था प्रदान करेगा