SEBI ने Specialised Investment Funds (SIFs) के लिए नए और सख्त नियम लागू किए हैं, जो इस हाई-रिस्क निवेश श्रेणी में पारदर्शिता और सुरक्षा दोनों बढ़ाने का लक्ष्य रखते हैं। ये नए नियम जुलाई 2025 से लागू हो चुके हैं और निवेशकों के लिए न्यूनतम निवेश ₹10 लाख तय किया गया है। SEBI का कहना है कि SIFs म्यूचुअल फंड और Portfolio Management Services (PMS) के बीच एक सेतु का काम करेंगे, जिससे निवेशकों को मंझे हुए और अधिक रणनीतिक विकल्प मिल सकेंगे। नए नियमों के तहत, SIFs में निवेश करने के लिए हर निवेशक को PAN स्तर पर कुल ₹10 लाख निवेश करना अनिवार्य होगा। यह थ्रेशोल्ड इसलिए रखा गया है ताकि केवल अनुभवी और समझदार निवेशक ही इस श्रेणी तक पहुंच सकें। निवेश रणनीतियों में लांग-शॉर्ट इक्विटी फंड, फोकस्ड सेक्टर रोटेशन, डेब्ट लांग-शॉर्ट फंड और डायनामिक एसेट एलोकेशन जैसे विकल्प शामिल हैं, जिनमें 25% तक शॉर्ट एक्सपोजर की क्षमता भी होगी। SEBI ने AMCs और फंड मैनेजर्स को जिम्मेदारी दी है कि वे रोजाना निवेशकों की पूंजी की जांच करें और सुनिश्चित करें कि ₹10 लाख के न्यूनतम निवेश की सीमा बनी रहे। यदि किसी निवेशक की कुल यूनिट वैल्यू ₹10 लाख से नीचे गिरती है (मार्केट लॉस को छोड़कर), तो उसकी यूनिट्स ऑटोमैटिकली रिडीम हो जाएंगी। यह नियम नए निवेशकों के साथ-साथ मौजूदा निवेशकों पर भी लागू होगा। Compliance की जांच NAV के आधार पर End-of-day की जाएगी
SIF लॉन्च करने के लिए भी SEBI ने कड़ी योग्यता तय की है। फंड मैनेजर या AMC को या तो तीन साल से अधिक समय से संचालित होना चाहिए और कम से कम ₹10,000 करोड़ की Assets Under Management (AUM) होनी चाहिए, या फिर Chief Investment Officer के पास दस साल का अनुभव होना चाहिए और वह ₹5,000 करोड़ से अधिक संपत्ति का प्रबंधन कर चुका हो, साथ ही एक Fund Manager का तीन साल का अनुभव होना आवश्यक है। ब्रांडिंग के मामले में भी SEBI ने अलग नियम बनाए हैं। SIFs को म्यूचुअल फंड्स से अलग पहचान देने के लिए अलग नाम, लोगो, और वेबसाइट या वेबपेज रखना अनिवार्य होगा। Sponsor branding पांच साल तक इस्तेमाल की जा सकेगी लेकिन उसका फॉन्ट SIF नाम से छोटा होना चाहिए ताकि भ्रम न रहे। नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए SEBI ने Compliance Monitoring का एक तंत्र भी बनाया है। AMC को रोजाना जांच करनी होगी कि निवेशक की कुल होल्डिंग ₹10 लाख से ऊपर बनी रहे। यदि कोई “active breach” होता है, जैसे कि रिडेम्प्शन या ट्रांसफर के कारण निवेश ₹10 लाख से नीचे चला जाता है, तो उस निवेशक की सभी SIF यूनिट्स फ्रीज कर दी जाएंगी। निवेशक को 30 कैलेंडर दिन का नोटिस मिलेगा, जिसमें वह अपनी स्थिति सुधार सकता है। अगर निवेशक इस अवधि में पुनः थ्रेशोल्ड पूरा कर लेता है तो यूनिट्स अनफ्रीज हो जाएंगी, बिना किसी पेनाल्टी के
लेकिन अगर वह नहीं करता, तो नोटिस पीरियड खत्म होने के अगले बिजनेस डे पर सभी फ्रीज्ड यूनिट्स अपने NAV पर ऑटोमैटिकली रिडीम हो जाएंगी। विश्लेषकों का मानना है कि भले ही यह एक नियंत्रित फंड स्ट्रक्चर हो, लेकिन SIFs में जोखिम पारंपरिक म्यूचुअल फंड्स से कहीं अधिक है। इन फंड्स में शॉर्ट पोजीशंस और कंसंट्रेटेड पोर्टफोलियो होते हैं, जो लाभ को बढ़ाने के साथ-साथ नुकसान की संभावना भी बढ़ाते हैं। इसके अलावा, SIFs के पास अभी तक कोई ऐतिहासिक प्रदर्शन डेटा उपलब्ध नहीं है, जिससे निवेशकों को जोखिम का आकलन करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि निवेशकों को अपनी जोखिम क्षमता और वित्तीय लक्ष्यों के अनुसार ही इन फंड्स में निवेश करना चाहिए। SEBI का यह नया फ्रेमवर्क म्यूचुअल फंड्स और हाई-एंड PMS या Alternative Investment Funds (AIFs) के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करता है। यह निवेशकों को एक नियंत्रित माहौल में मंझे हुए और परिष्कृत निवेश विकल्प प्रदान करता है, जो पारंपरिक म्यूचुअल फंड्स से अधिक सक्रिय हैं लेकिन PMS या AIFs की जटिलताओं से कम। अंततः SEBI के SIF नियम निवेशकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बनाए गए हैं। ₹10 लाख की न्यूनतम निवेश सीमा, कड़ी पात्रता मानदंड, अलग ब्रांडिंग और सख्त अनुपालन जांच से यह सुनिश्चित होगा कि केवल सक्षम और अनुभवी निवेशकों को ही SIFs में प्रवेश मिले। यह निवेशकों को परिष्कृत रणनीतियों तक पहुंच प्रदान करता है, लेकिन साथ ही उन्हें उच्च जोखिम के प्रति सचेत भी करता है
इस नई पहल से भारत के निवेश बाजार में एक नया अध्याय शुरू होने वाला है, जहां अधिक पारदर्शिता और जिम्मेदारी के साथ जोखिम भरे निवेश विकल्प उपलब्ध होंगे