India की इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने पिछले कुछ वर्षों में एक जबरदस्त बदलाव देखा है। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह रही सरकार की रणनीतिक पहल, खासकर Production Linked Incentive (PLI) scheme, जो “Make in India” अभियान का अहम हिस्सा है। इस योजना ने न सिर्फ देश में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा दिया बल्कि भारत को ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट के क्षेत्र में शीर्ष तीन देशों में शामिल कर दिया है। FY22 में $15.7 बिलियन की इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट, FY25 तक बढ़कर $38.6 बिलियन तक पहुंच गई है, जो 30% से ज्यादा की सालाना ग्रोथ दर्शाती है। PLI scheme ने Electronics Manufacturing Services (EMS) सेक्टर को एक नया competitive edge दिया है। इस low-margin, high-volume इंडस्ट्री में इस योजना ने ऑपरेटिंग मार्जिन्स को 0.6 से 1 प्रतिशत तक बढ़ाने में मदद की, जिससे कंपनियां वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कीमतें दे पाईं और विदेशी ग्राहकों को आकर्षित कर सकीं। विश्वभर की कंपनियां “China+1” रणनीति अपनाकर सप्लाई चेन में विविधता ला रही हैं, जिससे India एक पसंदीदा मैन्युफैक्चरिंग डेस्टिनेशन बनकर उभरा है। इसी वजह से भारत में FDI इनफ्लो में तेजी आई है और असेंबली, टेस्टिंग व पैकेजिंग जैसी सुविधाओं में भारी निवेश हुआ है। लेकिन अब PLI scheme के समाप्ति के करीब आने के कारण EMS कंपनियां एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी हैं। सीधे इंसेंटिव हटने से मार्जिन्स कम हो सकते हैं और भारत की कीमत प्रतिस्पर्धा में कमी आ सकती है
इस स्थिति में, उद्योग को सरकार की सब्सिडी पर निर्भरता छोड़कर खुद को मजबूत, नवाचारशील और मूल्य-सृजन पर केंद्रित करना होगा। आगे के दौर में EMS सेक्टर के लिए कुछ रणनीतियां बेहद जरूरी हैं। सबसे पहले, बैकवर्ड इंटीग्रेशन पर जोर देना होगा। इसका मतलब है कि भारत में Printed Circuit Boards (PCBs), Integrated Circuits (ICs) और सेंसर जैसे मुख्य कंपोनेंट्स का स्थानीयकरण करना ताकि सप्लाई चेन में नियंत्रण बढ़े और ग्लोबल डिस्टर्बेंस कम हों। इससे आयात पर निर्भरता घटेगी और भारत का स्थान ग्लोबल वैल्यू चेन में सिर्फ असेंबलर से बढ़कर Original Design Manufacturer (ODM) के रूप में मजबूत होगा। दूसरी महत्वपूर्ण रणनीति है R&D और डिज़ाइन क्षमता में निवेश। फिलहाल भारत की EMS कंपनियां उत्पादन पर ज्यादा ध्यान देती हैं और R&D में निवेश 0.5% से भी कम है, जो वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले काफी कम है। PLI के बाद यह बदलाव अनिवार्य हो गया है ताकि कंपनियां Original Design Manufacturing की दिशा में बढ़ें, जिसके जरिए उन्हें उच्च मार्जिन, प्रॉपर्टी सॉल्यूशन्स और वैश्विक बाजार में अलग पहचान मिल सके। R&D पर ध्यान देने से ब्रांडिंग मजबूत होगी और ग्राहक आधार भी टिकाऊ होगा। तीसरी रणनीति के रूप में ऑटोमेशन और डिजिटाइजेशन को अपनाना होगा
Industry 4.0 तकनीकों जैसे रोबोटिक्स, AI-आधारित क्वालिटी कंट्रोल, IoT और प्रिडिक्टिव मेंटेनेंस से उत्पादन क्षमता बढ़ेगी, त्रुटियां कम होंगी और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन सुनिश्चित होगा। इस डिजिटल क्रांति के बिना, सब्सिडी हटने के बाद भी उत्पादकता बनाए रखना मुश्किल होगा। चौथी बात, उत्पाद पोर्टफोलियो में विविधता लाना जरूरी है। फिलहाल EMS कंपनियां ज्यादातर स्मार्टफोन और कंजूमर इलेक्ट्रॉनिक्स में केंद्रित हैं, पर अब उन्हें ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल डिवाइसेज, एयरोस्पेस, इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन और डिफेंस सिस्टम्स जैसे उच्च-मूल्य और उच्च-वृद्धि वाले क्षेत्रों में विस्तार करना होगा। इससे न केवल व्यवसाय में स्थिरता आएगी बल्कि प्रीमियम बाजारों में भी पहुंच बनेगी। अंत में, सरकार की नई और चालू नीतियों जैसे SPECS (Scheme for Promotion of Manufacturing of Electronic Components and Semiconductors) और अन्य राज्य स्तर के इंसेंटिव प्रोग्राम्स का लाभ उठाना होगा। हालांकि PLI योजना समाप्त हो रही है, लेकिन ये समर्थन योजनाएं पूंजी-गहन क्षेत्रों में कंपनियों को आगे बढ़ने में मदद करेंगी। PLI योजना ने भारतीय EMS कंपनियों को वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बनाने का अवसर दिया है। अब समय है कि ये कंपनियां सरकार के समर्थन से बाजार की मांग और प्रतिस्पर्धा के हिसाब से अपने आप को ढालें। इस बदलाव के लिए जरूरी है कि वे मात्र उत्पादन से मूल्य निर्माण की ओर बढ़ें, सब्सिडी पर निर्भरता छोड़ें और डिज़ाइन तथा नवाचार को प्राथमिकता दें
जो कंपनियां इन रणनीतियों को अपनाएंगी, वे न केवल मार्केट शेयर बनाए रखेंगी बल्कि आने वाले समय में वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की अगुवाई भी करेंगी। भारत ने साबित कर दिया है कि वह मैन्युफैक्चर कर सकता है, अब वक्त है कि वह डिज़ाइन करे, नवाचार करे और वैश्विक स्तर पर नेतृत्व करे