भारतीय शेयर बाजार के दो प्रमुख एक्सचेंज, NSE और BSE, Sebi द्वारा जारी किए गए नए प्रूडेंशियल नियमों को लागू करने के लिए अपनी मौजूदा नॉन-बेंचमार्क इंडेक्स संरचनाओं में बदलाव करने की योजना बना रहे हैं। Sebi ने मई 29, 2025 को एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें डेरिवेटिव्स के लिए योग्य इंडेक्स पर कड़े मानदंड तय किए गए हैं। इन नियमों के तहत नॉन-बेंचमार्क इंडेक्स में कम से कम 14 स्टॉक्स होने चाहिए, किसी भी एक स्टॉक का वेटेज 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए, जबकि शीर्ष तीन स्टॉक्स का कुल वेटेज 45 प्रतिशत के अंदर रहना जरूरी है। इसके अलावा, सभी कंस्टीट्यूटेंट्स के लिए वेटेज स्ट्रक्चर धीरे-धीरे घटता हुआ होना चाहिए। इसका मकसद डेरिवेटिव्स के लिए उपयोग किए जाने वाले इंडेक्स को व्यापक और संतुलित बनाना है, जिससे कुछ चुनिंदा स्टॉक्स पर अत्यधिक निर्भरता न रहे। BSE ने अपने फीडबैक में बताया कि उसका केवल एक नॉन-बेंचमार्क इंडेक्स, Bankex, इस नियम से प्रभावित होगा। वर्तमान में Bankex में केवल 10 कंस्टीट्यूटेंट्स हैं और इस इंडेक्स को कोई ETF या इंडेक्स फंड ट्रैक नहीं करता। इसलिए BSE ने Sebi को सुझाव दिया है कि Bankex में एक बार की समायोजन प्रक्रिया के जरिए कंस्टीट्यूटेंट्स और वेटेज को नियमों के अनुरूप बनाया जाए। इससे Bankex में आवश्यक बदलाव बिना किसी बड़े व्यवधान के हो सकेंगे। वहीं NSE ने दो प्रमुख इंडेक्स, Nifty Bank और Nifty Financial Services (Fin Nifty), जिनमें क्रमशः 12 और 20 कंस्टीट्यूटेंट्स हैं, के लिए बदलाव का रास्ता अपनाने की बात कही है
ये दोनों इंडेक्स बेहद लोकप्रिय हैं और इनके तहत ETF और इंडेक्स फंड में कुल लगभग ₹34,251 करोड़ और ₹511 करोड़ का एसेट मैनेजमेंट है। NSE ने नए इंडेक्स बनाने के बजाय मौजूदा इंडेक्स में समायोजन करने का पक्ष लिया है क्योंकि नए इंडेक्स बनाने से बाजार में लिक्विडिटी बंट सकती है, डेरिवेटिव्स मार्केट में उलझन पैदा हो सकती है और निवेशकों के लिए भ्रम की स्थिति बन सकती है। Sebi के नियमों के अनुसार, अगर किसी इंडेक्स में शीर्ष स्टॉक का वेटेज 20 प्रतिशत से अधिक है, तो इसे धीरे-धीरे कम किया जाना चाहिए। इसके लिए NSE ने एक “glide path” यानी क्रमिक समायोजन मॉडल पेश किया है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी स्टॉक का वर्तमान वेटेज 28 प्रतिशत है, तो इसे चार चरणों में 20 प्रतिशत तक लाया जाएगा। हर महीने के शुरू में वेटेज को इस फार्मूले के जरिए कम किया जाएगा: – पहले महीने में (Actual weight – Desired weight)/4 – दूसरे महीने में (Actual weight – Desired weight)/3 – तीसरे महीने में (Actual weight – Desired weight)/2 – चौथे महीने में (Actual weight – Desired weight) इस तरीके से समायोजन करने पर बड़े पैसिव फंड्स को अपने पोर्टफोलियो को बिना किसी बड़े झटके के पुनःसंतुलित करने का मौका मिलेगा। इस प्रक्रिया में नए कंस्टीट्यूटेंट्स को पहले चरण में जोड़ा जाएगा और चौथे चरण के अंत तक शीर्ष तीन कंस्टीट्यूटेंट्स का वेटेज Sebi के नियमों के अनुरूप होगा। अगर किसी चरण में शीर्ष तीन स्टॉक्स का वेटेज निर्धारित सीमा से ऊपर गया, तो शेष चरणों में समायोजन जारी रहेगा। इस समायोजन की प्रक्रिया NSE ने म्यूचुअल फंड्स, AMFI के प्रतिनिधियों सहित विभिन्न बाजार सहभागियों के साथ बातचीत के बाद सुझाई है। अधिकांश बाजार प्रतिभागियों ने मौजूदा नॉन-बेंचमार्क इंडेक्स में संशोधन को बेहतर विकल्प माना है क्योंकि इससे बाजार में स्थिरता बनी रहेगी और निवेशकों को भी सुविधा होगी
Sebi ने इस प्रस्तावित योजना पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया आमंत्रित की है और कहा है कि इच्छुक पक्ष 8 सितंबर, 2025 तक अपने सुझाव दे सकते हैं। Sebi के अनुसार, यह कदम इसलिए जरूरी है क्योंकि अगर इंडेक्स में कुछ चुनिंदा स्टॉक्स का अत्यधिक वेटेज होगा तो इससे मार्केट मैनिपुलेशन की संभावना बढ़ सकती है। हाल ही में Jane Street के खिलाफ Sebi ने आरोप लगाया था कि उसने Nifty Bank और इसके तीन प्रमुख कंस्टीट्यूटेंट्स HDFC Bank, ICICI Bank और Kotak Mahindra Bank के साथ मिलकर डेरिवेटिव्स में मैनिपुलेशन किया था, जहां इन तीनों स्टॉक्स का कुल वेटेज 65 प्रतिशत था। इस पूरे बदलाव का मकसद भारतीय शेयर बाजार को अधिक पारदर्शी, संतुलित और निवेशकों के लिए सुरक्षित बनाना है। NSE और BSE की यह पहल Sebi के निर्देशों का अनुपालन करते हुए डेरिवेटिव्स मार्केट की मजबूती को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। निवेशकों को अब इन बदलावों पर नजर रखनी होगी क्योंकि आने वाले महीनों में Nifty Bank, Fin Nifty और Bankex जैसे प्रमुख इंडेक्स में यह समायोजन लागू होंगे, जो बाजार की दिशा और निवेश रणनीतियों को प्रभावित कर सकते हैं