भारतीय पूंजी बाजार में Indian private promoters की हिस्सेदारी लगातार गिरावट पर है और अब यह 8 वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। 30 जून, 2025 तक private promoters की कुल हिस्सेदारी 40.58 प्रतिशत रह गई है, जो 31 मार्च, 2025 के 40.81 प्रतिशत से कम है। यह पिछली बार सितंबर 2017 के अंत में 40.19 प्रतिशत पर थी। खास बात यह है कि मार्च 2022 से लेकर अब तक पिछले 13 तिमाहियों में private promoters का हिस्सा 45.13 प्रतिशत से गिरकर 40.58 प्रतिशत हो गया है, यानी लगभग 455 basis points की कमी आई है। इसी दौरान, Indian private promoters का शेयर 36.86 प्रतिशत से घटकर 32.56 प्रतिशत हो गया है, जबकि foreign promoters की हिस्सेदारी भी 8.28 प्रतिशत से कम होकर 8.02 प्रतिशत रह गई है। दूसरी ओर, सरकार की हिस्सेदारी में थोड़ी वृद्धि हुई है, जो 9.27 प्रतिशत से बढ़कर 9.39 प्रतिशत हो गई है। PRANAV Haldea, Managing Director, PRIME Database Group के अनुसार, promoter की खरीदारी हमेशा सकारात्मक संकेत होती है, लेकिन promoter की बिक्री के कई कारण हो सकते हैं। इनमें बाजार के तेजी के दौरान मुनाफा निकालना, कर्ज घटाना, विरासत योजना, परोपकार, अन्य निवेश या Minimum Public Shareholding (MPS) की आवश्यकताओं को पूरा करना शामिल है। इसके अलावा, हाल की IPO कंपनियों में promoters की तुलनात्मक रूप से कम हिस्सेदारी और बाजार का institutionalisation भी इस गिरावट के पीछे की वजहें हैं। वहीं, Haldea ने यह भी कहा है कि जब तक promoters की बिक्री के बाद भी उनका हिस्सा पर्याप्त रहता है, और बिक्री बाजार मूल्य से बहुत बड़े डिस्काउंट पर नहीं होती तथा कंपनी के मूलभूत तत्वों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आता, तब तक निवेशकों को चिंता करने की जरूरत नहीं है
इस समय घरेलू institutional investors (DIIs) ने foreign institutional investors (FIIs) को पीछे छोड़ते हुए अपने हिस्से को और मजबूत किया है। 30 जून, 2025 तक DIIs का हिस्सा 17.82 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो मार्च 2025 की 17.62 प्रतिशत से बढ़ा है। इस तिमाही में DIIs ने कुल मिलाकर लगभग ₹1.68 लाख करोड़ का नेट निवेश किया है। खासतौर पर domestic mutual funds (MFs) ने ₹1.17 लाख करोड़ का निवेश किया है, जो SIP के जरिए आने वाले रिटेल फंड्स की वजह से संभव हुआ है। इसी वजह से mutual funds की हिस्सेदारी NSE पर सूचीबद्ध कंपनियों में 10.56 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो मार्च से बढ़कर 10.35 प्रतिशत हो गई है। इसके अलावा, domestic insurance companies ने भी इस तिमाही में लगभग ₹8,076 करोड़ की खरीदारी की, हालांकि उनकी कुल हिस्सेदारी 5.40 प्रतिशत से घटकर 5.30 प्रतिशत हो गई। Alternative Investment Funds (AIFs) ने भी ₹3,617 करोड़ का नेट खरीदारी किया है। वहीं, बैंक और Portfolio Management Services (PMS) ने क्रमशः ₹10,704 करोड़ और ₹3,016 करोड़ की नेट बिक्री की है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारतीय शेयर बाजार में private promoters की हिस्सेदारी घट रही है, लेकिन institutional investors खासकर domestic mutual funds और insurance कंपनियां बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रही हैं। यह बाजार में निवेश के नए रुझान और पूंजी प्रवाह की दिशा को स्पष्ट करता है
इस बदलाव के कई कारण हो सकते हैं, जैसे promoters का अपनी पूंजी को डाइवर्सिफाई करना, बाजार की स्थिति का लाभ उठाकर मुनाफा निकालना, या कंपनियों की रणनीतिक जरूरतें। बावजूद इसके, विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक promoters की हिस्सेदारी पर्याप्त बनी रहती है और कंपनी के fundamentals में कोई बड़ा उलटफेर नहीं होता, तब तक यह गिरावट निवेशकों के लिए चिंता का विषय नहीं होनी चाहिए। भारतीय पूंजी बाजार में institutional investors की बढ़ती भूमिका से यह संकेत मिलता है कि बाजार और अधिक व्यवस्थित और पेशेवर होता जा रहा है, जहां long-term निवेशकों की भागीदारी बढ़ रही है। यह विकास आर्थिक स्थिरता और बाजार की गहराई के लिए सकारात्मक माना जा सकता है। हालांकि, promoters की घटती हिस्सेदारी एक ऐसा विषय है जिसे निवेशक और बाजार विशेषज्ञ लगातार नजर रख रहे हैं, क्योंकि promoters की हिस्सेदारी कंपनी के नियंत्रण और रणनीतिक दिशा को प्रभावित करती है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि क्या promoters अपने शेयरों की बिक्री की इस प्रक्रिया को जारी रखेंगे या कोई नया रुख अपनाएंगे। कुल मिलाकर, Indian private promoters की हिस्सेदारी में यह गिरावट और domestic institutional investors की बढ़ती हिस्सेदारी बाजार की बदलती संरचना और निवेश प्रवृत्तियों का साफ संकेत है, जो भविष्य में भारतीय शेयर बाजार की दिशा और गति को प्रभावित कर सकता है