Trump के 25% Tariff से भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर, US-India संबंधों में बढ़ा तनाव अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने भारत समेत कई देशों पर कड़ी टैरिफ नीति लागू की है, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था और बाजारों पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। Trump ने भारत पर 25% का टैरिफ लगाया है, जबकि बेसलाइन टैरिफ अधिकांश देशों के लिए 15% है। इसके अलावा, भारत के रूस से तेल और रक्षा उपकरण खरीदने पर भी अमेरिका ने दंडात्मक कार्रवाई की धमकी दी है, जिससे भारत-यूएस के बीच ‘स्पेशल रिलेशनशिप’ पर सवाल उठने लगे हैं। Trump ने पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को और गहरा करते हुए उसके तेल भंडारों के विकास का संकेत दिया है, जबकि पाकिस्तान की टैरिफ दर सिर्फ 19% है, जो भारत से कई गुना कम है। यह साफ बताता है कि अमेरिका भारत पर व्यापारिक दबाव बनाने के लिए ये टैरिफ बढ़ा रहा है। इस टैरिफ युद्ध ने अमेरिका में 1930 के दशक के बाद से सबसे ऊंचे सीमा शुल्क दरों को जन्म दिया है, जो वैश्विक व्यापार के लिए चिंता का विषय है। हालांकि, IMF ने वैश्विक आर्थिक विकास के प्रति आशावाद दिखाया है क्योंकि कंपनियां टैरिफ से पहले स्टॉक बढ़ा रही हैं और वित्तीय स्थितियां भी ढीली हैं। इसीलिए भारतीय बाजारों की शुरुआती प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत शांत रही। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह प्रभाव पहले से ही बाजारों में समाहित है और कुछ क्षेत्रों में यह खरीदारी का अवसर भी बन सकता है। घरेलू संस्थागत निवेशकों ने भरोसा बनाए रखा है और इस साल अब तक Rs 4 लाख करोड़ से अधिक की इक्विटी प्रवाह दर्ज की गई है
वहीं, वैश्विक फंड जैसे GQG, BlackRock, और Invesco ने उभरते बाजारों से भारी निकासी की है। मुद्रा पर इसका प्रभाव स्पष्ट है। Trump’s टैरिफ की धमकी रुपये को कमजोर कर सकती है, जबकि RBI को फेडरल रिजर्व की कड़ी नीति के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। ऊर्जा सुरक्षा भारत के लिए एक बड़ी चिंता बनी हुई है। भारत का रूस से तेल खरीदना अमेरिकी दंडात्मक कदमों के खतरे को बढ़ा रहा है, जो इस बात को लेकर दुविधा पैदा करता है कि क्या भारत अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखते हुए अमेरिकी दबाव से बच सकता है या नहीं। आर्थिक मंदी के संकेत भी सामने आ रहे हैं। अप्रैल-जून तिमाही में केंद्रीय सरकार की सकल कर आय में गिरावट आई है, जो आर्थिक सुस्ती को दर्शाती है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 23 में से 10 सेक्टर अभी भी कोविड-19 से पहले के स्तर से नीचे उत्पादन कर रहे हैं। निजी क्षेत्र की हिचकिचाहट को सरकार के कैपेक्स निवेश ने कुछ हद तक संतुलित किया है। Maruti, Dabur, और Dalmia Bharat जैसे उद्योगों में बिक्री में गिरावट देखी गई, जबकि HUL और Shriram Finance में ग्रामीण बाजार से सकारात्मक संकेत मिले हैं
मौसमी स्थिति अच्छी है, मुद्रास्फीति नियंत्रण में है, सेवा निर्यात मजबूत हैं और विदेशी मुद्रा भंडार भी ठीक-ठाक हैं। ये घरेलू ताकतें वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद सकारात्मक संकेत देती हैं। RBI के लिए मौद्रिक नीति में और ढील देने की गुंजाइश बनी हुई है। कॉर्पोरेट परिणाम मिश्रित हैं। Mahindra & Mahindra ने उत्पादन बढ़ाने की योजना बनाई है, जबकि रक्षा क्षेत्र की कंपनियों को भू-राजनीतिक तनाव से लाभ मिलने की उम्मीद है। वाणिज्यिक वाहन क्षेत्र भी धीरे-धीरे मंदी से उबर रहा है। TCS ने लागत में कटौती की रणनीति अपनाई है, लेकिन विकास की गति अभी अनिश्चित है। कर्मचारी छंटनी की बढ़ती प्रवृत्ति के बावजूद IT सेक्टर में निवेशकों का भरोसा बना हुआ है, जो AI के क्षेत्र में बड़े निवेशों के कारण है। Tata Steel कठिन वैश्विक स्टील परिदृश्य में लागत नियंत्रण, हरित तकनीक और पूंजी प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। रियल एस्टेट क्षेत्र में भी उम्मीद बनी हुई है, खासकर प्रीमियम और लक्जरी सेगमेंट में
Sri Lotus Developers & Realty Ltd ने भी अपने IPO के जरिए निवेशकों का ध्यान आकर्षित किया है। घरेलू तरलता और मुद्रास्फीति से बचाव के लिए सोने की मांग बनी हुई है। भारत के सामने बड़ी चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ व्यापक व्यापार समझौता करते हुए अपनी विविध साझेदारियों को बनाए रखे, घरेलू विनिर्माण को मजबूत करे और मुद्रा दबावों का सामना करते हुए मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखे। भारतीय कंपनियों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे राजनीतिक फैसलों के बीच अपने व्यावसायिक मॉडल को कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से ढाल पाती हैं। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह टैरिफ दौर तो एक सियासी तमाशा है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजारों को इसके बीच से रास्ता निकालना होगा। भारत-यूएस संबंधों में यह तनाव नई आर्थिक और रणनीतिक चुनौतियां लेकर आया है, जिनका सामना करना अब सरकार और उद्योग दोनों के लिए जरूरी हो गया है